Gita Darshan, Adhyaya 10-गीता-दर्शन, अध्याय दस

Talk #8 from  गीता-दर्शन, अध्याय दस – Gita Darshan, Adhyaya 10

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श्रीमद्भगवद्गीता पर ओशो के प्रवचन।
Gita Darshan, Adhyaya 10-गीता-दर्शन, अध्याय दस
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विवरण

श्रीमद्भगवद्गीता पर ओशो के प्रवचन।

मनुष्य का जो मन है, वह पहले चित्रों की भाषा में सोचता है, फिर शब्दों की भाषा विकसित होती है। और अभी भी रात जब आप सपने देखते हैं, तो चित्रों की भाषा में देखते हैं, क्योंकि सपने में आप अपनी शिक्षा-दीक्षा सब भूल जाते हैं। जो भाषा आपको सिखाई गई है प्रतीकों की
"मनुष्य का जो मन है, वह पहले चित्रों की भाषा में सोचता है, फिर शब्दों की भाषा विकसित होती है। और अभी भी रात जब आप सपने देखते हैं, तो चित्रों की भाषा में देखते हैं, क्योंकि सपने में आप अपनी शिक्षा-दीक्षा सब भूल जाते हैं। जो भाषा आपको सिखाई गई है प्रतीकों की, संकेतों की, गणित की, व्याकरण की, वह सब आप भूल जाते हैं। सपने में आप फिर प्रिमिटिव हो जाते हैं, सपने में फिर उन पुरानी अवस्थाओं में पहुंच जाते हैं, जहां हम चित्रों से सोच सकते हैं। दुनिया की जो प्राचीनतम भाषाएं हैं, वे चित्रों वाली हैं। जैसे चीनी है, वह चित्र की भाषा है। अभी भी उसके पास वर्णाक्षर नहीं हैं। बहुत कठिन है, क्योंकि हर चीज का चित्र, बहुत लंबी प्रक्रिया है। अगर चीनी भाषा को किसी को पढ़ना हो, तो कम से कम दस वर्ष तो लग ही जाएंगे और तब भी प्राथमिक ज्ञान ही होगा। कम से कम एक लाख शब्द-चित्र तो याद होने ही चाहिए साधारण ज्ञान के लिए भी। हर चीज का चित्र है। जो प्राचीनतम भाषा होगी, वह चित्रों में होगी। बच्चों का मन प्राचीनतम मन है। वे चित्रों से समझते हैं। तो हमें कहना पड़ता है, ग गणेश का। ग से गणेश का कोई संबंध नहीं है, क्योंकि ग गधे का भी उतना ही है। लेकिन गणेश का या गधे का चित्र हम बनाएं, तो बच्चे को ग समझाना आसान हो जाता है। पुरानी किताबों में गणेश का चित्र होता था, नई किताबों में गधे का चित्र है, इसलिए मैं कह रहा हूं। क्योंकि सेक्युलर है गवर्नमेंट, धर्म-निरपेक्ष है राज्य। गणेश का चित्र नहीं बना सकते! तो पुरानी किताबों में ग गणेश का होता था, नई किताबों में ग गधे का है। ग को समझाना हो, तो गणेश को रखना पड़ता है। फिर जब बच्चा समझ लेगा, तो गणेश को छोड़ देगा, ग रह जाएगा। अगर बाद में भी आप पढ़ते वक्त हर बार कहें कि ग गणेश का, तो फिर पढ़ना मुश्किल हो जाएगा। फिर गणेश को भूल जाना पड़ेगा और ग को याद रखना पड़ेगा। लेकिन ग को याद करने में पहले गणेश का उपयोग लिया जा सकता है, लिया जाता है। और अब तक कोई शिक्षा-पद्धति विकसित नहीं हो सकी, जिसमें हम बिना चित्रों का उपयोग किए बच्चों को शब्दों का बोध करा दें। कृष्ण ने मौलिक बात कह दी है कि मैं समस्त आत्माओं में आत्मा हूं। मैं समस्त आत्माओं का केंद्र हूं। मैं समस्त हृदयों का हृदय हूं। मेरा ही विस्तार है सब कुछ--आदि भी, मध्य भी, अंत भी। लेकिन वह बहुत गहरा भाव है और अर्जुन को भी पकड़ में नहीं आएगा। इसलिए कृष्ण अब चित्रों का प्रयोग करते हैं, और चित्रों के माध्यम से उस भाव की तरफ इशारा करते हैं। अर्जुन जो चित्र समझ सकेगा, निश्चित ही उनका ही उपयोग किया गया है। कृष्ण ने कहा, और हे अर्जुन, मैं अदिति के पुत्रों में विष्णु हूं। इस प्रतीक को हम समझें। तीन नाम से हम निरंतर परिचित रहे हैं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश। हिंदू चिंतना में ब्रह्मा सृजन के प्रतीक हैं, महेश विसर्जन के, अंत के, विनाश के और विष्णु मध्य के, विस्तार के। विष्णु सम्हालते हैं अस्तित्व को। जो सम्हालने की शक्ति है, वह विष्णु का नाम है। जो जन्म की शक्ति है, सृजन की, वह ब्रह्मा। और जो विनाश की, प्रलय की शक्ति है, वह शिव या महेश।"

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Publisher Osho International
अवधि (मिनट) 94
Type एकल टॉक