Gita Darshan, Adhyaya 10-गीता-दर्शन, अध्याय दस
Talk #5 from गीता-दर्शन, अध्याय दस – Gita Darshan, Adhyaya 10
स्टॉक में
श्रीमद्भगवद्गीता पर ओशो के प्रवचन।
विवरण
श्रीमद्भगवद्गीता पर ओशो के प्रवचन।
इसलिए किसी व्यक्ति को महामानव मान लेने में अड़चन नहीं है, महात्मा मान लेने में अड़चन नहीं है। हमसे संबंध नहीं टूटता। हमारे ही रास्ते पर कोई हमसे दो कदम आगे होता है, कोई दस कदम आगे होता है। अहंकार को तकलीफ होती है इसमें भी कि किसी को मैं आगे मानूं! लेकिन फ
"इसलिए किसी व्यक्ति को महामानव मान लेने में अड़चन नहीं है, महात्मा मान लेने में अड़चन नहीं है। हमसे संबंध नहीं टूटता। हमारे ही रास्ते पर कोई हमसे दो कदम आगे होता है, कोई दस कदम आगे होता है। अहंकार को तकलीफ होती है इसमें भी कि किसी को मैं आगे मानूं! लेकिन फिर भी अहंकार इससे नष्ट नहीं होता। हम किसी को अपने से आगे मान सकते हैं।
कभी-कभी ऐसा भी होता है कि अपने से किसी को आगे मानने में भी अहंकार को तृप्ति मिलती है। वह तृप्ति जरा सूक्ष्म है। जिसे हम अपने से आगे मानते हैं, यह मानने के कारण ही हम उससे संयुक्त हो जाते हैं। और यह मानने के कारण ही हम उसको पहचानने वाले हो जाते हैं। और यह मानने के कारण ही हम भी अपने भविष्य में कभी उस जैसा होने की संभावना का अहंकार पोषित कर सकते हैं।
लेकिन किसी व्यक्ति को ईश्वर मानने में हमारी सारी तर्क-सरणी टूट जाती है, हमारी सारी अंतर्व्यवस्था अस्तव्यस्त हो जाती है। ईश्वर मानने का अर्थ ही यह हुआ कि वह हमसे बिलकुल भिन्न है। भिन्नता इतनी गहरी है कि हम उसे समझ भी नहीं पा सकते कि वह क्या है।
कृष्ण ने जो भी कहा है, वह असंभव है। असंभव है बुद्धि के लिए। अर्जुन उसके उत्तर में जो कह रहा है, वह बहुत सोचने जैसा है। और जैसा ऊपर से दिखाई पड़ता है, वैसा उसका अर्थ नहीं है। और जैसा भी आपको अर्थ दिखाई पड़ता रहा होगा, थोड़ा गहरे उतरेंगे, तो उससे बिलकुल विपरीत अर्थ पाएंगे।
अर्जुन ने कृष्ण की ये सारी बातें सुनकर कि मैं परमात्मा हूं; मैं ही सबमें व्याप्त हूं; सब कुछ मेरे ही द्वारा धारण किया गया है; समस्त ऋषियों में मेरे ही भाव प्रकट हुए हैं; और समस्त श्रेष्ठताओं और समस्त शक्तियों का मैं ही आधार और बीज हूं; और जहां भी जीवन में कोई सुगंध ऊंचाई छूती है, और जब भी कोई शिखर गौरीशंकर होता है, तब उस श्रेष्ठता की अंतिम स्थिति में जो खिलता है, जो फूल खिलता है, वह मैं ही हूं। मैं ही इस जीवन का आभिजात्य, मैं ही इस जीवन का रस, मैं ही इस जीवन का प्राण, मैं ही इस जीवन का केंद्र हूं। ये बातें कृष्ण ने कहीं, जो बड़ी असंभव हैं किसी बुद्धि को मानने के लिए। अर्जुन ने जो उत्तर दिया, इसलिए बहुत सोचने जैसा है।
इस प्रकार कृष्ण के वचनों को सुनकर अर्जुन ने कहा, हे भगवन्, आप परम ब्रह्म और परम धाम एवं परम पवित्र हैं। आपको सब ऋषिजन सनातन दिव्य पुरुष एवं देवों का भी आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं। वैसे ही देवऋषि नारद तथा असित और देवल ऋषि तथा महर्षि व्यास और स्वयं आप भी ऐसी ही घोषणा मेरे प्रति करते हैं। और हे केशव, जो कुछ भी मेरे प्रति आप कहते हैं, इस समस्त को मैं सत्य मानता हूं। हे भगवन्, आपके लीलामय स्वरूप को न दानव जानते हैं और न देवता ही जानते हैं।
ठीक ऊपर से देखने पर लगेगा कि अर्जुन ने सब कुछ स्वीकार कर लिया। काश, अर्जुन यह सब कुछ स्वीकार कर ले, तो गीता यहीं समाप्त हो जाती; आगे गीता निष्प्रयोजन है। फिर कहने को कुछ और बचता नहीं, और समझाने को भी कुछ बचता नहीं। आखिरी बात पूरी हो गई। अल्टिमेट, जो आत्यंतिक घटना घटनी चाहिए अर्जुन के भीतर, वह घट गई। लेकिन गीता समाप्त नहीं होती है और कृष्ण को और भी श्रम लेना पड़ता है। यह वक्तव्य जैसा दिखाई पड़ता है, वैसा नहीं होगा, इसीलिए। इसमें तीन बातें खयाल में ले लेने जैसी हैं।
अर्जुन कहता है कि आप परम ब्रह्म, परम धाम, परम पवित्र हैं, क्योंकि ऐसा ही ऋषियों ने भी कहा है, महर्षियों ने भी कहा है।"
अधिक जानकारी
| Publisher | Osho International |
|---|---|
| अवधि (मिनट) | 84 |
| Type | एकल टॉक |
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