Gita Darshan, Adhyaya 10-गीता-दर्शन, अध्याय दस
Talk #13 from गीता-दर्शन, अध्याय दस – Gita Darshan, Adhyaya 10
स्टॉक में
श्रीमद्भगवद्गीता पर ओशो के प्रवचन।
विवरण
श्रीमद्भगवद्गीता पर ओशो के प्रवचन।
जो भी है, दूसरे क्षण वही नहीं रह जाता है।
यूनान में विचारक हुआ है, हेराक्लतु। हेराक्लतु ने कहा है, एक ही नदी में दो बार उतरना असंभव है। यू कैन नाट स्टेप ट्वाइस इन दि सेम रिवर। कैसे उतरिएगा एक ही नदी में दो बार? जब दुबारा आप उतरने जाएंगे, नदी बह चुकी है।
"जो भी है, दूसरे क्षण वही नहीं रह जाता है।
यूनान में विचारक हुआ है, हेराक्लतु। हेराक्लतु ने कहा है, एक ही नदी में दो बार उतरना असंभव है। यू कैन नाट स्टेप ट्वाइस इन दि सेम रिवर। कैसे उतरिएगा एक ही नदी में दो बार? जब दुबारा आप उतरने जाएंगे, नदी बह चुकी है। जिस जल को आपने पहली बार स्पर्श किया था, अब आप उसे दुबारा स्पर्श न कर पाएंगे।
लेकिन हेराक्लतु ने कोई अतिशयोक्ति नहीं की। यह ओवर स्टेटमेंट नहीं है, अंडर स्टेटमेंट है। उसने कुछ कहा, वह कहा जाना चाहिए उससे कम है। सचाई तो यह है कि यू कैन नाट स्टेप ईवेन वंस इन दि सेम रिवर। एक बार भी एक ही नदी में उतरना असंभव है। क्योंकि जब आपका पैर नदी की ऊपर की सतह को छूता है, तब तक नीचे का पानी बह चुका; और जब आपका पैर एक कदम नीचे जाता है, तब तक ऊपर का पानी बह चुका। नदी बह रही है, बहने का नाम नदी है। बहाव सतत है।
जीवन की नदी भी वैसी ही सतत है, वैसा ही बहाव है। जीवन में भी दुबारा उसी जगह खड़े होना असंभव है। और दुबारा वही देखना भी असंभव है, जो देखा। हमें भ्रांति लेकिन होती है। हम सोचते हैं, रोज वही सूरज निकलता है।
वही सूरज रोज नहीं निकल सकता है। सूरज रूपांतरित हो रहा है प्रतिपल। सूरज जलती हुई आग है। और जैसे लपटें प्रतिपल बदल रही हैं, जैसे दीए की लौ प्रतिपल बदल रही है, ऐसा ही सूरज भी प्रतिपल बदल रहा है।
सांझ आप एक दीया जलाते हैं, सुबह सोचते हैं, उसी दीए को बुझा रहे हैं; तो आप गलती में हैं। सांझ जो दीया जलाया था, वह तो न मालूम कितनी बार बुझ चुका। लौ प्रतिपल खो रही है आकाश में; नई लौ उसकी जगह स्थापित होती चली जा रही है। लेकिन यह इतनी तीव्रता से हो रहा है, यह लौ का प्रवाह इतना त्वरित है कि दो लौ के बीच में आप खाली जगह नहीं देख पाते। इसलिए सोचते हैं, एक ही लौ रातभर जलती रही; सुबह हम उसी दीए को बुझा रहे हैं।
अगर उसी दीए को सुबह बुझा रहे हैं, तो रातभर जो तेल जला, वह कहां गया? रातभर तेल जलता रहा और दीए की लौ बदलती रही। सुबह आप दूसरी ही लौ बुझा रहे हैं। वही लौ नहीं, जो आपने सांझ जलाई थी। निश्चित ही, उसी श्रृंखला की लौ है, उसी लौ की संतान है, लेकिन वही लौ नहीं है।
सूरज भी ऐसा ही बदल रहा है। छोटा-सा दीया बदल रहा है इतनी तेजी से। उतना बड़ा सूरज और भी बड़ी तेजी से बदल रहा है। सुबह रोज वही सूरज नहीं उगता। और आप सोचते हों, सुबह रोज वही पृथ्वी दिखाई पड़ती है, तो भी गलती में हैं। और आप सोचते हों कि रोज उन्हीं वृक्षों के पास से आप गुजरते हैं, तो भी आप भूल में हैं। सब बदल रहा है। बदलाहट इतनी तीव्र है कि आपको दिखाई नहीं पड़ती।
जैसे बहुत तेजी से बिजली का पंखा चल रहा हो, तो उसकी पंखुड़ियां दिखाई नहीं पड़तीं। वैज्ञानिक कहते हैं कि इतनी तेजी से बिजली का पंखा चलाया जा सकता है कि आप अगर गोली भी मारें, तो बीच की जगह से नहीं निकले, पंखड़ी में ही लगे। वैज्ञानिक कहते हैं, इतनी तेजी से भी बिजली का पंखा चलाया जा सकता है कि आप उस पर बैठ जाएं और आपको पता न चले कि पंखा चल रहा है।"
अधिक जानकारी
| Publisher | Osho International |
|---|---|
| अवधि (मिनट) | 98 |
| Type | एकल टॉक |
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