जीवन दर्शन – Jeevan Darshan
विवरण
पूछा है: आप सब धर्मों के विरुद्ध हैं, तो क्या सब महापुरुष झूठे हैं या कि आप? मैं निश्चिय ही सब धर्मों के विरोध में हूं, क्योंकि मैं धर्म के पक्ष में हूं। जिसे धर्म के पक्ष में होना है, उसे धर्मों के विरोध में होना पड़ेगा। धर्म एक है। हिंदू और मुसलमान, ईसाई और जैन इसलिए धर्म नहीं हो सकते। जहां अनेकता है, फिर वहां धर्म नहीं हो सकता। रिलीजंस के मैं विरोध में हूं; क्योंकि मैं रिलीजन के पक्ष में हूं। धर्म, जीवन के भीतर जो चैतन्य है, उसका विज्ञान है। पदार्थ का विज्ञान एक है। कैमिस्ट्री हिंदुओं की अलग होती है, मुसलमानों की अलग? फिजिक्स भारत की अलग और इंग्लैंड की अलग होती है? और गणित भारत का अलग और चीनियों का अलग होता है? नहीं, प्रकृति के नियम एक हैं। वे चीनी और भारतीय में भेद नहीं करते। वे पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी में अंतर नहीं करते। प्रकृति की भाषा एक है, वह हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू में फर्क नहीं करती। अगर प्रकृति के और पदार्थों के नियम एक हैं, तो क्या परमात्मा के नियम अनेक हो सकते हैं?
आत्मा के नियम अनेक हो सकते हैं? उसके नियम भी एक हैं, वे नियम भी यूनिवर्सल हैं। उन नियमों को हम अब तक नहीं खोज पाए, इसलिए कि यह हमारे धर्मों के अत्यधिक मोह ने धर्म को जन्मने नहीं दिया। कोई हिंदू है, कोई जैन, कोई मुसलमान, कोई ईसाई। और वे सब इतने अतिशय रूप से किसी पंथ, किसी पथ, किसी शास्त्र, किसी शब्द से बंधे हैं कि वे यूनिवर्सल, सार्वलौकिक सत्य को देखने में समर्थ नहीं रह गए हैं। क्योंकि सार्वलौकिक सत्य हो सकता है उनके शास्त्र को कहीं-कहीं गलत छोड़ जाए, कहीं-कहीं गलत कर जाए। तो वे अपने शास्त्र के इतने पक्ष में हैं कि सत्य के पक्ष में नहीं हो सकते।
इसलिए दुनिया के पंथों ने दुनिया में सार्वलौकिक धर्म, यूनिवर्सल रिलीजन को पैदा नहीं होने दिया। मैं पांथिकता के विरोध में हूं, सांप्रदायिकता के विरोध में हूं। धर्म के विरोध में नहीं हूं। धर्म के विरोध में तो कोई हो ही नहीं सकता है। क्योंकि जो चीज एक ही है, उसके विरोध में नहीं हुआ जा सकता। विरोध में होते से दो चीजें हो जाएंगी। सत्य के विरोध में कोई भी नहीं हो सकता; सिद्धांतों के विरोध में हो सकता है। सत्य के विरोध में कोई भी नहीं हो सकता; शास्त्रों के विरोध में हो सकता है। तो मैं उस सत्य की, उस धर्म की आपसे बात कर रहा हूं, जो एक है, और एक ही हो सकता है। इसलिए अनेक से जो हमारा बंधा हुआ चित्त है, उसे मुक्त करना जरूरी है। और यह आपसे किसने कहा कि मैं महापुरुषों के विरुद्ध हूं? यह आपसे किसने कहा? यह आपसे किसने कह दिया कि मैं महापुरुषों के विरोध में हूं? नहीं; लेकिन एक बात के विरोध में मैं जरूर हूं। जब तक हम दुनिया में महापुरुष बनाए चले जाएंगे, तब तक छोटे पुरुष भी पैदा होते रहेंगे; वे बंद नहीं हो सकते। जब हम एक व्यक्ति को महान कहते हैं, तो हम शेष सबको क्षुद्र और नीचा कह देते हैं। यह हमें दिखाई ही नहीं पड़ता कि एक आदमी के सम्मान में शेष सबका अपमान छिपा होता है। जब हम एक व्यक्ति को पूज्य बना देते हैं, तो शेष सबको...।
और जब हम एक की मंदिर में प्रतिष्ठा कर देते हैं, तो बाकी सबकी...। ये महानताएं क्षुद्रताओं पर खड़ी हैं। अगर दुनिया से क्षुद्रताएं मिटानी हों, तो स्मरण रखिए, महानताओं को भी विदा कर देना होगा। नहीं तो ये दोनों बातें साथ-साथ जिंदा रहेंगी। मैं महापुरुषों के पक्ष में नहीं हूं, लेकिन मनुष्य के भीतर जो महान है, उसके पक्ष में हूं। और हर मनुष्य के भीतर महान छिपा है। किसी में प्रकट, किसी में अप्रकट। लेकिन जिसमें अप्रकट है, उसे भी नीचा कहने का कोई कारण नहीं है। ओशो
अधिक जानकारी
| Publisher | OSHO Media International |
|---|---|
| ISBN-13 | 978-81-7261-333-4 |
| Dimensions (size) | 140 x 216 mm |
| Number of Pages | 156 |
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