नहिं राम बिन ठांव – Nahin Ram Bin Thaon
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ओशो के सोलह अमृत उद्बोधन, जिनमें साधकों द्वारा की गई जिज्ञासाओं का अपूर्व समाधान है।
विवरण
ओशो के सोलह अमृत उद्बोधन, जिनमें साधकों द्वारा की गई जिज्ञासाओं का अपूर्व समाधान है।
शब्द के तल पर जो परिचय है उसे परिचय कहना भी ठीक नहीं। धर्म के आयाम में, शब्द से बड़ा कोई धोखा नहीं है।
शब्द तो समझ में आ जाता है, उसमें जरा भी कठिनाई नहीं, लेकिन शब्द में जो छिपा है वह समझ के बाहर रह जाता है। वहीं असली कठिनाई है।
और शब्द समझ में आ जाए, शब्द में जो छिपा है वह समझ के बाहर रह जाए, तो जीवन में बड़ा उपद्रव पैदा होता है। अज्ञानी रहते हुए ज्ञानी होने का भ्रम शुरू हो जाता है। इससे बड़ी मुसीबत दूसरी नहीं है। जानते नहीं हैं; और लगता है, जानते हैं।
और जीना तो वहां से होगा, जहां जानना है। जीवन तो जानने से रूपांतरित होगा। इस भ्रांति के कारण कि शब्द को जान लिया, इसलिए धर्म को जान लिया, हमारा जीवन एक दिशा में और हमारा मन दूसरी दिशा में यात्रा करता है। अक्सर वे दिशाएं विपरीत होती हैं।
पाखंड, हिपोक्रेसी इसलिए तथाकथित धार्मिक आदमी की जीवन-चर्या बन जाता है। तथाकथित धार्मिक आदमी नितांत पाखंडी मालूम होता है। कहता कुछ है, जीता कुछ है। और उसके जीवन और उसके कहने में, कहीं कोई तालमेल नहीं दिखाई पड़ता। यह जो गैर-तालमेल है, यह पैदा होता है शब्द को समझ लेने से। इस संबंध में कुछ बातें और विचार कर लें, फिर हम प्रश्न को लें।
ईश्वर, आत्मा, मोक्ष, सुनते ही समझ में आ जाते हैं। क्योंकि अर्थ हमें शब्दकोश में जो लिखा है वह पता है। मोक्ष का अर्थ हमें मालूम है, ईश्वर का अर्थ हमें मालूम है, आत्मा का अर्थ हमें मालूम है। लेकिन अर्थ तो अस्तित्व नहीं है। ईश्वर कहने से, ईश्वर सुनने से, ईश्वर का कोई भी पता नहीं चलता। ईश्वर शब्द तो ईश्वर नहीं है। जो बोल रहा है, उसने अगर जाना है, तो भी वह अपने ज्ञान को आप तक नहीं पहुंचा सकता। शब्द ही जाएंगे, ज्ञान तो पीछे रह जाएगा। शब्द याददाश्त के हिस्से हो जाएंगे, स्मृति भरी-पूरी हो जाएगी, स्मृति सघन हो जाएगी, स्मृति का बोझ हो जाएगा, स्मृति शास्त्र बन जाएगी। और आपको भ्रांति पैदा होगी कि ईश्वर को मैं जानता हूं, क्योंकि ईश्वर शब्द को आपने सुना, पढ़ा और भाषाकोश में अर्थ लिखा है।
लेकिन बिना ईश्वर तक गए कोई कैसे ईश्वर को जान सकेगा? काश, इतना सरल होता कि भाषाकोश को जानकर हम ईश्वर को जान लेते, तो अब तक पृथ्वी पर कोई अज्ञानी न बचता, अभी तक सभी ज्ञानी हो गए होते। अगर मोक्ष का अभिप्राय, मोक्ष शब्द की व्युत्पत्ति में, उसके व्याकरण में छिपा होता, तो सभी मुक्त हो गए होते, बंधन में कोई भी न होता। —ओशो
अधिक जानकारी
| Publisher | Osho Media International |
|---|---|
| Type | फुल सीरीज |
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