ध्यान-सूत्र – Dhyan Sutra

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ध्यान साधना शिविर, महाबलेश्वर में ध्यान-प्रयोगों एवं प्रश्नोत्तर सहित हुई प्रवचनमाला के अंतर्गत ओशो द्वारा दिए गए नौ प्रवचन
ध्यान साधना शिविर, महाबलेश्वर में ध्यान-प्रयोगों एवं प्रश्नोत्तर सहित हुई प्रवचनमाला के अंतर्गत ओशो द्वारा दिए गए नौ प्रवचन

उद्धरण : ध्यान-सूत्र - नौवां प्रवचन - आमंत्रण—एक कदम चलने का

"यदि परमात्मा को पाने का खयाल आपके भीतर एक लपट बन गया हो, तो उस खयाल को जल्दी कार्य में लगा देना। जो शुभ को करने में देर करता है, वह चूक जाता है। और जो अशुभ को करने में जल्दी करता है, वह भी चूक जाता है। शुभ को करने में जो देर करता है, वह चूक जाता है। और अशुभ को करने में जो जल्दी करता है, वह चूक जाता है।

जीवन का सूत्र यही है कि अशुभ को करते समय रुक जाओ और देर करो, और शुभ को करते समय देर मत करना और रुक मत जाना।

अगर कोई शुभ विचार खयाल में आ जाए, तो उसे तत्क्षण शुरू कर देना उपयोगी है। क्योंकि कल का कोई भरोसा नहीं है। आने वाले क्षण का कोई भरोसा नहीं है। हम होंगे या नहीं होंगे, नहीं कहा जा सकता। इसके पहले कि मृत्यु हमें पकड़ ले, हमें निर्णायक रूप से यह सिद्ध कर देना है कि हम इस योग्य नहीं थे कि मृत्यु ही हमारा भाग्य हो। इसके पूर्व कि मृत्यु हमें पकड़ ले, हमें यह सिद्ध कर देना है कि हम इस योग्य नहीं थे कि मृत्यु ही हमारा भाग्य हो। मृत्यु से ऊपर का कुछ पाने की क्षमता हमने विकसित की थी, यह मृत्यु के आने तक तय कर लेना है। और वह मृत्यु कभी भी आ सकती है, वह किसी भी क्षण आ सकती है। अभी बोल रहा हूं और इसी क्षण आ सकती है। तो मुझे उसके लिए सदा तैयार होने की जरूरत है। प्रतिक्षण मुझे तैयार होने की जरूरत है।

तो कल पर न टालना।… सबसे बड़ा महत्वपूर्ण बोध मृत्यु का बोध है साधक को। उसे प्रतिक्षण ज्ञात होना चाहिए कि कोई भी क्षण मौत हो सकती है। आज सांझ मैं सोऊंगा, हो सकता है, यह आखिरी सांझ हो और सुबह हम न उठें। तो मुझे आज रात सोते समय इस भांति सोना चाहिए कि मैंने अपने जीवन का सारा हिसाब निपटा लिया है और अब मैं निश्चिंत सो रहा हूं। अगर मौत आएगी, तो उसका स्वागत है।"—ओशो
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Publisher OSHO Media International
ISBN-13 978-81-7261-041-8
Number of Pages 168