Adhyatma Upanishad-अध्यात्म उपनिषद

Trackअध्यात्म उपनिषद – Adhyatma Upanishad

स्टॉक में
ध्यान साधना शिविर, माउंट आबू में हुई वार्ता माला के अंतर्गत ओशो द्वारा अध्यात्म उपनिषद के सूत्रों पर दिए गए सत्रह वार्ता
ध्यान साधना शिविर, माउंट आबू में हुई वार्ता माला के अंतर्गत ओशो द्वारा अध्यात्म उपनिषद के सूत्रों पर दिए गए सत्रह वार्ता

पहली बात, चित्त एक प्रवाह है, बदलता हुआ। इसलिए चित्त के द्वारा उसे नहीं जाना जा सकता जो कभी बदलता नहीं है। जिसके द्वारा हम जान रहे हैं, अगर वह बदलता हुआ हो, तो हम उसे नहीं जान सकते जो कभी बदलता नहीं है। बदलती हुई चीज के माध्यम से हम जो भी जानेंगे वह भी बद
"हेराक्लतु ने कहा है, एक ही नदी में दुबारा नहीं उतरा जा सकता। क्योंकि जब आप दुबारा उतरने जाएंगे तो जिस पानी में पहली बार उतरे थे, वह न मालूम कहां जा चुका। ऐसे ही एक ही चित्त को भी दुबारा नहीं पाया जा सकता; जो बह गया, वह बह गया। और पूरे समय भीतर धारा बह रही है। इस बहती धारा के पीछे खड़े होकर हम देख रहे हैं जगत को। तो चित्त की छाया हर चीज पर पड़ती है। और बदलता हुआ चित्त, खंड-खंड हजार टुकड़ों में टूटा हुआ चित्त, सारे जगत को भी तोड़ देता है। तो पहली बात, चित्त एक प्रवाह है, बदलता हुआ। इसलिए चित्त के द्वारा उसे नहीं जाना जा सकता जो कभी बदलता नहीं है। जिसके द्वारा हम जान रहे हैं, अगर वह बदलता हुआ हो, तो हम उसे नहीं जान सकते जो कभी बदलता नहीं है। बदलती हुई चीज के माध्यम से हम जो भी जानेंगे वह भी बदलता हुआ ही दिखाई पड़ेगा। जैसे आपकी आंख पर एक चश्मा हो, और उस चश्मे का रंग बदल रहा हो--लाल से हरा हो जाए, हरे से पीला हो जाए, पीले से सफेद हो जाए--आपके चश्मे का रंग बदल रहा हो, तो उसके साथ ही बाहर का जो जगत है, उसका रंग बदलता चला जाएगा; क्योंकि जिस माध्यम से आप देख रहे हैं, वह आरोपित हो रहा है। मन आपका बदल रहा है, प्रतिपल। इसी कारण मन से हम केवल उसी को जान सकते हैं, जो बदल रहा है; मन से उसे नहीं जान सकते, जो कभी नहीं बदलता है। और इस जीवन का जो परम गुह्य सत्य है, वह अपरिवर्तनीय है; वह शाश्वत है, वह कभी बदलता नहीं। इसलिए चित्त उसे जानने का मार्ग नहीं है। जगत की जो पदार्थ सत्ता है, वह बदलती है; वह मन की तरह ही बदलती है। इसलिए मन से जगत के पदार्थ को जाना जा सकता है, लेकिन जगत में छिपे परमात्मा को नहीं जाना जा सकता। जैसे विज्ञान मन का उपयोग करता है, चित्त का उपयोग करता है खोज के लिए; विज्ञान मन के ही माध्यम से जगत की खोज करता है। और इसलिए विज्ञान कभी भी नहीं कह पाएगा कि ईश्वर है। विज्ञान सदा ही कहेगा, पदार्थ है। परमात्मा की कोई प्रतीति विज्ञान में उपलब्ध नहीं होगी। नहीं इसलिए कि परमात्मा नहीं है, बल्कि इसलिए कि विज्ञान जिस माध्यम का उपयोग कर रहा है, वह माध्यम केवल परिवर्तनशील को ही जान पाता है; वह माध्यम अपरिवर्तनीय को नहीं जान पाएगा। ऐसा समझें कि संगीत चल रहा हो, और आप आंख से सुनने की कोशिश करें, तो आप कभी भी न सुन पाएंगे; संगीत का पता ही नहीं चलेगा। आंख देख सकती है, इसलिए आंख से रूप का पता चल सकता है। आंख सुन नहीं सकती, इसलिए ध्वनि का कोई पता नहीं चल सकता है। कान सुन सकते हैं, देख नहीं सकते। लेकिन कान से अगर कोई देखने की कोशिश करे, तो वह कहेगा, जगत में कोई रूप है ही नहीं। कान को तो ध्वनि ही पकड़ में आती है। माध्यम जो पकड़ सकता है, उसी को जान सकता है।"
अधिक जानकारी
Publisher Osho International
अवधि (मिनट) 105
Type एकल टॉक