Adhyatma Upanishad-अध्यात्म उपनिषद

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ध्यान साधना शिविर, माउंट आबू में हुई वार्ता माला के अंतर्गत ओशो द्वारा अध्यात्म उपनिषद के सूत्रों पर दिए गए सत्रह वार्ता
ध्यान साधना शिविर, माउंट आबू में हुई वार्ता माला के अंतर्गत ओशो द्वारा अध्यात्म उपनिषद के सूत्रों पर दिए गए सत्रह वार्ता

यह सूत्र ध्यान के लिए बड़ा सहयोगी है। शरीर की कोई निंदा नहीं है इस सूत्र में, इसे ठीक से समझ लें। धर्म किसी की भी निंदा में उत्सुक नहीं है; न ही किसी की प्रशंसा में उत्सुक है; धर्म तो जैसा है उसे जानने में उत्सुक है।तो जब यह कहते हैं कि शरीर हड्डी-मांस-म
"कभी शरीर को भीतर से देखने का प्रयास करें, तो यह सूत्र समझ में आ सकेगा। कभी अस्पताल में चले जाएं, कभी आपरेशन की टेबल पर खड़े हो जाएं, देखें सर्जन को शरीर का आपरेशन करते हुए, तो भीतर जो दिखाई पड़े, शरीर की वस्तुस्थिति वही है। यह सूत्र ध्यान के लिए बड़ा सहयोगी है। शरीर की कोई निंदा नहीं है इस सूत्र में, इसे ठीक से समझ लें। धर्म किसी की भी निंदा में उत्सुक नहीं है; न ही किसी की प्रशंसा में उत्सुक है; धर्म तो जैसा है उसे जानने में उत्सुक है। तो जब यह कहते हैं कि शरीर हड्डी-मांस-मज्जा, मल-मूत्र, इन सबका जोड़ है; तो ध्यान रखना, कहीं भी निंदा का कोई भाव नहीं है। यह कोई शरीर को नीचा दिखाने की चेष्टा नहीं है; शरीर ऐसा है। शरीर का जो होना है, उसको ही खोल कर रख देने की बात है। यह सूत्र कहता है: ‘यह शरीर माता-पिता के मैल से उत्पन्न हुआ, मल तथा मांस से भरा है। इसका, जैसे अपने ही पास, अपने ही निकट चंडाल खड़ा हो, शूद्र खड़ा हो, और उसका कोई त्याग करके दूर हट जाए, ऐसा ही इस शरीर का त्याग करके तू ब्रह्मरूप होकर कृतार्थ हो।’ चंडाल, शूद्र, बड़े मूल्यवान शब्द हैं। प्राचीन भारतीय मनोविज्ञान कहता है कि जो व्यक्ति भी अपने को शरीर मानता है, वह शूद्र है। शूद्र का अर्थ है जिसने अपने को शरीर मान रखा है। ब्राह्मण का अर्थ है जिसने अपने को ब्रह्म जान लिया। ब्राह्मण कोई ब्राह्मण के घर में पैदा होने से नहीं होता, न ही कोई शूद्र किसी शूद्र के घर में पैदा होने से शूद्र होता है। शूद्रता का और ब्राह्मणत्व का कोई भी संबंध घरों से नहीं है, परिवारों से नहीं है। शूद्र एक मनोदशा है, ब्राह्मण भी एक मनोदशा है। सभी लोग शूद्र की तरह पैदा होते हैं, कुछ ही लोग ब्राह्मण की तरह होकर मर पाते हैं। सारा जगत शूद्र है। शूद्र अर्थात जगत में सभी लोग अपने को शरीर मान कर जीते हैं। ब्राह्मण को खोजना बहुत मुश्किल है। ब्राह्मण के घर में पैदा होना कोई कठिन बात नहीं, ब्राह्मण होना बहुत मुश्किल है। उद्दालक ने अपने बेटे श्वेतकेतु को कहा है कि श्वेतकेतु, तू जा ऋषि के आश्रम में और ब्राह्मण होकर लौट। श्वेतकेतु ने पूछा, लेकिन ब्राह्मण मैं हूं ही, ब्राह्मणों का पुत्र हूं! तो उद्दालक ने बड़े मीठे वचन कहे हैं, और बड़े तीखे। उद्दालक ने कहा, हमारे घर में ऐसा कभी नहीं हुआ कि कोई सिर्फ हमारे घर में पैदा होने से ब्राह्मण हुआ हो, हम वस्तुतः ही ब्राह्मण होते रहे हैं। तो तू जा गुरु के आश्रम में और ब्राह्मण होकर वापस लौट। बाप से कहीं ब्राह्मणत्व मिला है? गुरु से मिलता है। और हमारे घर में नाम-मात्र का ब्राह्मण कभी भी नहीं हुआ, हम सदा ही ब्राह्मण होते रहे हैं। तू जा और जब ब्राह्मण हो जाए तो वापस लौट आना।"
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Publisher Osho International
अवधि (मिनट) 97
Type एकल टॉक