Adhyatma Upanishad-अध्यात्म उपनिषद

Trackअध्यात्म उपनिषद – Adhyatma Upanishad

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ध्यान साधना शिविर, माउंट आबू में हुई वार्ता माला के अंतर्गत ओशो द्वारा अध्यात्म उपनिषद के सूत्रों पर दिए गए सत्रह वार्ता
ध्यान साधना शिविर, माउंट आबू में हुई वार्ता माला के अंतर्गत ओशो द्वारा अध्यात्म उपनिषद के सूत्रों पर दिए गए सत्रह वार्ता

और ऐसा नहीं कि वह आज पास हो गया हो, वह सदा से ही पास है, अनंत-अनंत काल से पास है। उससे क्षण भर को भी हमारा छूटना और दूर होना नहीं हुआ है। हम जहां भागें, वह हमारे साथ भागता है। हम जहां जाएं, वह हमारे साथ जाता है। नर्कों में भी वह हमारे साथ यात्रा करता है औ
"और ऐसा नहीं कि वह आज पास हो गया हो, वह सदा से ही पास है, अनंत-अनंत काल से पास है। उससे क्षण भर को भी हमारा छूटना और दूर होना नहीं हुआ है। हम जहां भागें, वह हमारे साथ भागता है। हम जहां जाएं, वह हमारे साथ जाता है। नर्कों में भी वह हमारे साथ यात्रा करता है और स्वर्गों में भी। पाप में भी वह हमारे साथ उतना ही खड़ा होता है, जितना पुण्य में। यह कहना भी ठीक नहीं कि साथ खड़ा होता है, क्योंकि जो हमारे साथ होता है उससे भी थोड़ी दूरी होती है। हमारा होना और उसका होना एक ही बात है। अगर यह सच है, तो इस जगत में बड़ा चमत्कार हो गया कि हम अपने को ही खो बैठे! जो असंभव मालूम पड़ता है, अपने को कैसे खोया जा सकता है! अपनी छाया तक को खोना मुश्किल है। हम अपनी आत्मा को खो बैठे हैं, यह कैसे हो सकता है! पर यह हुआ है। उसके होने की घटना कैसे घटती है, वही इस सूत्र का सार है। इस सूत्र में प्रवेश करने के पहले इसके बुनियादी आधार समझ लें। आंख की सीमा है, एक परिधि है। उससे ज्यादा दूर हो तो आंख नहीं देख पाती, उससे ज्यादा पास हो तो भी आंख नहीं देख पाती। आंख के देखने का एक विस्तार है। किसी चीज को आंख के बहुत पास ले आएं, फिर आंख नहीं देख पाएगी; बहुत दूर ले जाएं तो भी आंख नहीं देख पाएगी। तो एक क्षेत्र है जहां आंख देखती है। और इस क्षेत्र के उस पार या इस पार आंख अंधी हो जाती है। और आप तो इतने निकट हैं कि आंख के पास ही नहीं हैं, आंख के पीछे हैं। यही अड़चन है। ऐसा समझें कि दर्पण के सामने खड़े हैं, तो एक खास दूरी से दर्पण पर ठीक प्रतिबिंब बनता है। अगर बहुत दूर चले जाएं तो फिर दर्पण पर प्रतिबिंब नहीं बनेगा। बहुत पास आ जाएं, कि आंख को दर्पण से ही लगा लें, तो प्रतिबिंब दिखाई नहीं पड़ेगा। लेकिन यहां मामला ऐसा है कि आप दर्पण के पीछे खड़े हैं; इसलिए दर्पण पर प्रतिबिंब बनने का कोई उपाय ही नहीं है। आंख आगे है, आप पीछे हैं। आंख देखती है उसको जो आंख के आगे हो। आंख उसको कैसे देखे जो आंख के पीछे है? कान सुनते हैं उसको जो कान के बाहर है। कान उसको कैसे सुनें जो कान के भीतर है? आंख बाहर खुलती है; कान भी बाहर खुलते हैं। मैं आपको छू सकता हूं, अपने को कैसे छुऊं? और अगर अपने शरीर को भी छू लेता हूं इसीलिए, तो वह इसीलिए कि शरीर भी मैं नहीं हूं, वह भी पराया है, इसलिए छू लेता हूं। लेकिन जो मैं हूं, जो छू रहा है, उसे कैसे छुऊं? उसे किससे छुऊं? इसलिए हाथ सब छू लेते हैं और खुद को नहीं छू पाते हैं; आंख सब देख लेती है और खुद को नहीं देख पाती है। अपने लिए हम बिलकुल अंधे हैं। हमारी कोई इंद्रिय काम की नहीं है। जिन इंद्रियों से हम परिचित हैं, वे कोई भी काम की नहीं हैं। अगर कोई और इंद्रिय का उदघाटन न हो जो भीतर देखती हो, अगर कोई और आंख न खुल जाए जो भीतर देखती हो, जो पीछे देखती हो, जो उलटा देखती हो, कोई कान न खुल जाए, जिस पर भीतर की ध्वनि-तरंगें भी प्रभाव लाती हों, तब तक हम स्वयं को देख और जान और सुन न पाएंगे। तब तक स्वयं को छूने का कोई उपाय नहीं है।"
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Publisher Osho International
अवधि (मिनट) 97
Type एकल टॉक