Adhyatma Upanishad-अध्यात्म उपनिषद

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ध्यान साधना शिविर, माउंट आबू में हुई वार्ता माला के अंतर्गत ओशो द्वारा अध्यात्म उपनिषद के सूत्रों पर दिए गए सत्रह वार्ता
ध्यान साधना शिविर, माउंट आबू में हुई वार्ता माला के अंतर्गत ओशो द्वारा अध्यात्म उपनिषद के सूत्रों पर दिए गए सत्रह वार्ता

विज्ञान करता है संदेह। सम्यक संदेह विज्ञान का सूत्र है; राइट डाउट। ठीक से संदेह करेंगे, तो ही विज्ञान विकसित होता है। संदेह करते चले जाएंगे, तो ही विज्ञान के तथ्य उपलब्ध होते हैं। संदेह, विज्ञान की खोज की प्रक्रिया है। और जब विज्ञान प्रतिष्ठित होने लगा, औ
विज्ञान करता है संदेह। सम्यक संदेह विज्ञान का सूत्र है; राइट डाउट। ठीक से संदेह करेंगे, तो ही विज्ञान विकसित होता है। संदेह करते चले जाएंगे, तो ही विज्ञान के तथ्य उपलब्ध होते हैं। संदेह, विज्ञान की खोज की प्रक्रिया है। और जब विज्ञान प्रतिष्ठित होने लगा, और जब विज्ञान की खोजें आदमी के उपयोग में आने लगीं, और जब छोटी सी सुई से लेकर एटम बम तक विज्ञान का फैलाव हो गया, और आदमी बिना विज्ञान के जीने में असमर्थ हो गया, और जब विज्ञान सब तरफ जीतने लगा, भौतिक जगत में सब तरफ उसकी पताका फहराने लगी, तो स्वभावतः, संदेह प्रतिष्ठित हो गया। क्योंकि संदेह से ही जन्मा विज्ञान, और विज्ञान जीता भौतिक जगत में--संदेह प्रतिष्ठित हो गया। आज सारे जगत में जो भी शिक्षा हम देते हैं, वह सभी शिक्षा संदेह की शिक्षा है। पहली कक्षा से लेकर और अंतिम विश्वविद्यालय की श्रेणियों तक हम संदेह सिखाते हैं। क्योंकि विचार संदेह के बिना होता ही नहीं। विचार करना हो, तो संदेह करना ही चाहिए। विचार को जितना तीव्र करना हो, उतने तीव्र संदेह की धार आवश्यक है। तो आधुनिक जगत की सारी संरचना विज्ञान से हुई है। खाते हैं, पीते हैं, उठते हैं, बैठते हैं, चलते हैं, जीते हैं, इस सब में विज्ञान प्रविष्ट हो गया है। और विज्ञान खड़ा है संदेह के आधार पर। इसलिए आज के मन की जो आधारशिला है वह संदेह है। आज कोई चीज चुपचाप मान लेने की नहीं। श्रद्धा आज का शब्द नहीं है। जब उपनिषद रचे गए, तो जैसे आज संदेह प्रतिष्ठित है, तब श्रद्धा प्रतिष्ठित थी। जैसे संदेह आधार है विज्ञान का, ऐसे ही श्रद्धा आधार है धर्म की; इसको ठीक से खयाल में ले लें। जैसे संदेह के बिना विचार नहीं हो सकता, ऐसे ही श्रद्धा के बिना निर्विचारणा नहीं आ सकती। संदेह और श्रद्धा विपरीत हैं। अगर विचार करना है, तो ठीक संदेह आना चाहिए। फिर साहस से संदेह करना चाहिए। फिर इंच-इंच परख करनी चाहिए, और बिना तर्क को स्वीकृत हुए कोई चीज स्वीकार नहीं करनी चाहिए। जो हो परिणाम; लेकिन तर्क ही तब सहारा है, और संदेह ही तब नाव है--अगर विचार में गति पानी है। और अंततः अगर विचार से निष्कर्ष लेना है कोई, तो संदेह उपाय है। लेकिन धर्म विचार से संबंध ही नहीं रखता। धर्म का मामला ही उलटा है। धर्म कहता है, निर्विचार होना है। चूंकि निर्विचार होना है, इसलिए संदेह की कोई जगह नहीं रह जाती। निर्विचार होना है तो संदेह का कोई उपाय ही नहीं है। यह नाव काम की नहीं है। अगर निर्विचार होना है, तो संदेह से उलटी चीज काम की होगी; क्योंकि संदेह विचार का आधार है। श्रद्धा है संदेह से विपरीत: स्वीकार, मान लेना, ट्रस्ट, भरोसा। ये दोनों नावें हैं, इनकी यात्रा अलग-अलग है। किसी को वैज्ञानिक बनना हो तो श्रद्धा से नहीं बन सकता। और किसी को धार्मिक बनना हो, तो श्रद्धा के बिना नहीं बन सकता। जैसे आज विज्ञान सफल हुआ है और सब तरफ जीवन पर आच्छादित हो गया है, ऐसा ही उन दिनों धर्म सफल था और जीवन के रोएं-रोएं, पोर-पोर में समाविष्ट था। उन दिनों सफलता ही एक सफलता थी, वह धर्म की थी। कोई आदमी उन दिनों कितना ही बड़ा वैज्ञानिक हो जाता, तो भी लोगों के लिए वह पाने योग्य स्थिति न मालूम होती। उन दिनों पाने योग्य स्थिति थी किसी बुद्ध की, किसी कृष्ण की, किसी अंगीरस की, किसी रैक्व की; उस दिन पाने योग्य स्थिति थी। उस दिन हमने उन लोगों को देखा था, जैसे आज विज्ञान अपने चरम शिखर पर खड़ा है, ऐसा हमने उन दिनों धर्म को अपने चरम शिखर पर देखा था। —ओशो
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Publisher Osho International
अवधि (मिनट) 96
Type एकल टॉक