Adhyatma Upanishad-अध्यात्म उपनिषद

Trackअध्यात्म उपनिषद – Adhyatma Upanishad

स्टॉक में
ध्यान साधना शिविर, माउंट आबू में हुई वार्ता माला के अंतर्गत ओशो द्वारा अध्यात्म उपनिषद के सूत्रों पर दिए गए सत्रह वार्ता
ध्यान साधना शिविर, माउंट आबू में हुई वार्ता माला के अंतर्गत ओशो द्वारा अध्यात्म उपनिषद के सूत्रों पर दिए गए सत्रह वार्ता

चिकित्सक एक हो, लेकिन बीमार अलग-अलग होंगे तो दवा अलग-अलग हो जाएगी। बुद्ध के वचन सिद्धांत नहीं हैं। बुद्ध पुरुषों के वचन सिद्धांत नहीं हैं--दवाइयां हैं, औषधियां हैं। और इसलिए यह जानना जरूरी है कि किससे कही गई है बात।श्रुति अज्ञानियों से कुछ और कहती है, ज्
"चिकित्सक एक हो, लेकिन बीमार अलग-अलग होंगे तो दवा अलग-अलग हो जाएगी। बुद्ध के वचन सिद्धांत नहीं हैं। बुद्ध पुरुषों के वचन सिद्धांत नहीं हैं--दवाइयां हैं, औषधियां हैं। और इसलिए यह जानना जरूरी है कि किससे कही गई है बात। श्रुति अज्ञानियों से कुछ और कहती है, ज्ञानियों से कुछ और कहती है। ज्ञानियों से कहती है कि देह है ही नहीं, अज्ञानियों से कहती है देह है, लेकिन तुम देह नहीं हो। ज्ञानियों से कहती है देह है ही नहीं, बस तुम ही हो; अज्ञानियों से कहती है देह है, लेकिन तुम देह नहीं हो। ये दोनों बातें विपरीत हैं। अगर देह नहीं है, तो नहीं है, चाहे ज्ञानी से कही जाए, चाहे अज्ञानी से कही जाए। और अगर देह है, तो है, फिर ज्ञानी-अज्ञानी से क्या फर्क पड़ेगा? इसे थोड़ा हम सूक्ष्मता से समझ लें। एक तो ऐसे सत्य हैं, जिन्हें हम तथ्य कहते हैं; आब्जेक्टिव फैक्‌्रस। सुबह है। तो ज्ञानी हो या अज्ञानी, इससे क्या फर्क पड़ता है! सुबह है। और रात हो गई, सूरज ढल गया। तो ज्ञानी हो या अज्ञानी, इससे क्या फर्क पड़ता है! सूरज ढल गया और रात हो गई। विज्ञान तथ्यों की खोज करता है, इसलिए विज्ञान संगत भाषा बोलता है। विज्ञान, बाहर जो है उसकी बात करता है। इसलिए विज्ञान की भाषा में बड़ी संगति, कंसिस्टेंसी है। धर्म, भीतर जो देखने वाला है उसके अनुकूल भाषा बोलता है; सब्जेक्टिव है। तथ्य पर उतना जोर नहीं है, जितना दृष्टि पर जोर है। तो जो देखता है उसके हिसाब से भेद पड़ जाते हैं। ज्ञानी जब देखता है तो देह दिखाई ही नहीं पड़ती; अज्ञानी जब देखता है तो आत्मा का कोई पता नहीं चलता। अज्ञानी के देखने का ढंग ऐसा है कि देह ही पकड़ में आती है; और ज्ञानी के देखने का ढंग ऐसा है कि आत्मा ही पकड़ में आती है। ज्ञानी को देह दिखाई पड़नी असंभव है, अज्ञानी को आत्मा दिखाई पड़नी असंभव है। इसीलिए तो शंकर जैसे मनीषी कह सके कि जगत मिथ्या है, है ही नहीं। और बृहस्पति जैसे पदार्थवादी कह सके कि आत्मा-परमात्मा सब असत्य हैं, केवल पदार्थ है। इन दोनों में कोई विरोध नहीं है; क्योंकि इन दोनों में कहीं कोई मिलन ही नहीं होता। ये दो अलग ढंग से देखे गए वक्तव्य हैं। जीवन को देखने की व्यवस्था ही दोनों की अलग है। जहां से शंकर देखते हैं, वहां जगत दिखाई नहीं पड़ता; जहां से चार्वाक देखता है, वहां से जगत ही दिखाई पड़ता है। यह दृष्टि-भेद है। यह वक्तव्य बिलकुल अलग-अलग देखे गए लोगों के वक्तव्य हैं, जिनके देखने का ढंग अलग है। जैसे समझें कि अगर सुगंध ही आपकी परख का ढंग हो, अगर नाक ही सिर्फ आपके पास हो और गंध से ही आप पता लगाते हों...। बहुत से पशु-पक्षी हैं, बहुत से कीड़े-मकोड़े हैं, जो गंध से ही जीते हैं; गंध के ही आधार चलते हैं; गंध ही उनकी आंख है; गंध ही उनका मार्ग खोजने का ढंग है। ऐसे कीड़े-मकोड़ों को, जो गंध से ही चलते हैं, संगीत का कोई भी पता नहीं चलेगा; क्योंकि गंध से संगीत को जांचने का कोई उपाय नहीं है। संगीत में कोई गंध होती ही नहीं। अच्छा संगीत हो तो सुगंध नहीं होती और बुरा संगीत हो तो दुर्गंध नहीं होती; गंध का ध्वनि से कोई लेना-देना नहीं है। तो जिसके पास जांचने की व्यवस्था गंध की हो, वह ध्वनि से अपरिचित रह जाएगा; उसके लिए ध्वनि है ही नहीं। हमारे लिए वही है जगत में, जिसको जांचने का हमारे पास उपाय है।"
अधिक जानकारी
Publisher Osho International
अवधि (मिनट) 98
Type एकल टॉक