Adhyatma Upanishad-अध्यात्म उपनिषद

Trackअध्यात्म उपनिषद – Adhyatma Upanishad

स्टॉक में
ध्यान साधना शिविर, माउंट आबू में हुई वार्ता माला के अंतर्गत ओशो द्वारा अध्यात्म उपनिषद के सूत्रों पर दिए गए सत्रह वार्ता
ध्यान साधना शिविर, माउंट आबू में हुई वार्ता माला के अंतर्गत ओशो द्वारा अध्यात्म उपनिषद के सूत्रों पर दिए गए सत्रह वार्ता

आकर्षण है राग, विकर्षण है विराग--भाषा की दृष्टि से। जिसकी तरफ जाने का मन हो, वह है राग; और जिससे दूर हटने का मन हो, वह है विराग। विराग का अर्थ हुआ विपरीत राग। एक में खिंचते हैं पास, दूसरे में हटते हैं दूर। विराग राग से पूरी तरह मुक्ति नहीं है, उलटा राग है
"आकर्षण है राग, विकर्षण है विराग--भाषा की दृष्टि से। जिसकी तरफ जाने का मन हो, वह है राग; और जिससे दूर हटने का मन हो, वह है विराग। विराग का अर्थ हुआ विपरीत राग। एक में खिंचते हैं पास, दूसरे में हटते हैं दूर। विराग राग से पूरी तरह मुक्ति नहीं है, उलटा राग है। कोई धन की तरफ पागल है; धन मिल जाए तो सोचता है सब मिल गया। कोई सोचता है धन छोड़ दूं तो सब मिल गया! लेकिन दोनों की दृष्टि धन पर है। कोई सोचता है पुरुष में सुख है, स्त्री में सुख है; कोई सोचता है स्त्री-पुरुष के त्याग में सुख है। बाकी दोनों का केंद्र स्त्री या पुरुष का होना है। कोई सोचता है संसार ही स्वर्ग है और कोई सोचता है संसार नर्क है, लेकिन दोनों का ध्यान संसार पर है। भाषा की दृष्टि से विराग राग का उलटा रूप है, लेकिन अध्यात्म के खोजी के लिए वैराग्य राग का उलटा रूप नहीं, राग का अभाव है। इस फर्क को ठीक से समझ लें। शब्दकोश में देखेंगे तो राग का उलटा विराग है, अनुभव में उतरेंगे तो राग का उलटा विराग नहीं है, राग का अभाव, एब्सेंस, विराग है। फर्क थोड़ा बारीक है। स्त्री के प्रति आकर्षण है, यह राग हुआ। स्त्री के प्रति विकर्षण पैदा हो जाए, कि स्त्री को पास सहना मुश्किल हो जाए, स्त्री से दूर भागने की वृत्ति पैदा हो जाए, स्त्री से दूर-दूर रहने का मन होने लगे, यह हुआ विराग--भाषा, शब्द, शास्त्र के हिसाब से। अनुभव, समाधि के हिसाब से यह भी राग है। समाधि के हिसाब से विराग तब है, जब स्त्री में न आकर्षण हो, न विकर्षण हो; न खिंचाव हो और न विपरीत। स्त्री का होना और न होना बराबर हो जाए, पुरुष का होना, न होना बराबर हो जाए। गरीबी और समृद्धि बराबर हो जाए; चुनाव न रहे, अपना कोई आग्रह न रहे कि यह मिलेगा तो स्वर्ग, यह छूटेगा तो स्वर्ग; बाहर के मिलने और छूटने से कोई संबंध ही न रह जाए सुख का, सुख अपना ही हो जाए; बाहर कोई मिले, न मिले--ये दोनों बातें गौण, ये दोनों बातें व्यर्थ हो जाएं--तब वैराग्य। वैराग्य का अर्थ यह हुआ कि हमारी दृष्टि ही पर पर जानी बंद हो जाए: न अनुकूल, न प्रतिकूल; न आकर्षण में, न विकर्षण में। दूसरे से पूरा छुटकारा वैराग्य है। दूसरे से दो तरह के बंधन हो सकते हैं: मित्र मिलता है तो सुख होता है, शत्रु मिलता है तो दुख होता है; शत्रु जब छूट जाता है तो सुख होता है, मित्र छूट जाता है तो दुख होता है। बुद्ध ने कहा है--बड़ा गहरा मजाक किया है--बुद्ध ने कहा है कि शत्रु भी सुख देते हैं, मित्र भी दुख देते हैं। मित्र जब छूटते हैं तब दुख देते हैं, शत्रु जब मिलते हैं तब दुख देते हैं। फर्क क्या है? लेकिन शत्रु से भी हमारा लगाव रहता है; मित्र से भी लगाव रहता है। शत्रु मर जाए आपका, तो भी आपके भीतर कुछ टूट जाता है; खाली हो जाती है जगह। कई बार तो मित्र से भी ज्यादा खाली जगह हो जाती है शत्रु के मरने से, क्योंकि उससे भी एक राग था--उलटा राग था; उसके होने से भी आप जुड़े थे। मित्र से भी जुड़े हैं, शत्रु से भी जुड़े हैं। तो जिन चीजों से आपका विरोध हो गया है, उनसे भी संबंध है।"
अधिक जानकारी
Publisher Osho International
अवधि (मिनट) 105
Type एकल टॉक